वायु तत्व
सनातन शास्त्रों के अनुसार वायु तत्व माता पार्वती के अधीन माना गया है। धन-सम्पदा और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए माँ पार्वती की उपासना विशेष फलदायी होती है। वायु तत्व को प्राण का आधार कहा गया है, क्योंकि हमारे शरीर में वायु ही प्राणवायु के रूप में विद्यमान रहती है। जब शरीर से यह वायु बाहर निकल जाती है, तब प्राण भी निकल जाते हैं। यही कारण है कि वायु को ही आयु और जीवन का आधार कहा गया है।
वेदों और उपनिषदों में वायु को देवत्व प्राप्त है। शरीर की गति और स्पर्श की शक्ति वायु तत्व से ही आती है। प्राणों को प्राणवायु कहने का कारण भी यही है कि सम्पूर्ण प्राण शक्ति वायु पर ही टिकी है। धरती स्वयं भी श्वास लेती है और सम्पूर्ण जीव-जगत इसी वायु से जीवन प्राप्त करता है। शास्त्रों में वायु तत्व को गति, प्रेरणा और जीवन ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। यह समाज में व्यक्ति की स्थिति को आकार देता है तथा दूसरों को प्रेरित करने की शक्ति प्रदान करता है।
वास्तु और धर्मशास्त्र के अनुसार वायु तत्व का प्रभाव उत्तर-पश्चिम दिशा पर अधिक होता है। जब वायु तत्व संतुलित अवस्था में रहता है, तो व्यक्ति साहसपूर्वक नए कार्यों को अपनाता है, अपने विकास हेतु उचित जोखिम उठाता है और आत्म-खोज में आगे बढ़ता है। यह तत्व जीवन में ताजगी, आनंद और उत्साह लाता है। किंतु यदि वायु असंतुलित हो जाए तो व्यक्ति में हठ, क्रोध, अस्थिरता, समाज और पड़ोस के साथ विवाद, तथा जीवन में बाधाओं का अनुभव होने लगता है।
आयुर्वेद के अनुसार वायु तत्व के असंतुलन से शरीर में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। इससे त्वचा विकार, जोड़ों में पीड़ा, वात रोग और मानसिक उदासी प्रकट होती है। यहाँ तक कि यौन असंतोष जैसी स्थिति भी वायु दोष के कारण मानी गई है। इस प्रकार शास्त्रों में वायु तत्व को जीवन और स्वास्थ्य दोनों का आधार बताया गया है।
