


हमारे प्रयासों का लक्ष्य समाज के हर वर्ग, नदियों और प्रकृति के संरक्षण में योगदान देना है। आइए, मिलकर समाज, पर्यावरण और मानवता के लिए सकारात्मक बदलाव लाएं। आपका स्वागत है इस संकल्प यात्रा में।
सदियों से उपेक्षित किन्नर समाज को सम्मान, शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार दिलाना हमारा कर्तव्य है। आपके सहयोग से हम इस समाज को उनका खोया हुआ सम्मान और सामाजिक स्वीकृति दिला सकते हैं।
नर्मदा नदी जीवन दायिनी है। वृक्षारोपण और जल संरक्षण के माध्यम से हम न केवल नदियों को बचा सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और समृद्ध पर्यावरण सुनिश्चित कर सकते हैं। आइए, इस प्रयास में आपका योगदान दें।
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स्काई हेल्प ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना
स्काई हेल्प ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना वर्ष 2015 में समाज और प्रकृति की सेवा के संकल्प के साथ की गई। यह संगठन एक भारतीय विकास संस्था है, जिसका मूल उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, सामाजिक समानता और मानवीय उत्थान के लिए सतत प्रयास करना है। संस्थान का विश्वास है कि जब तक धरती हरी-भरी नहीं होगी, तब तक मानव जीवन सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिए हमारी प्रमुख कार्यधारा पर्यावरण और वृक्षारोपण के माध्यम से धरती को हराभरा बनाना, प्रदूषण को कम करना और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटना है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्वस्थ, सुरक्षित और सुखमय जीवन जी सकें।
श्री स्वामी दुर्गा दास
(अध्यक्ष)
जीवन परिचय
कई बार सामान्य से परिवेश में जन्म लेने वाला बालक समाज और दुनिया के समक्ष आदर्श प्रस्तुत कर जाता है।
वह ऐसा कार्य कर जाता है जिसे युगों तक मील के पत्थर की संज्ञा दी जाती है, और वह व्यक्ति कालजयी हो जाता है।
ऐसे ही एक बालक का जन्म 14 जून 1974 को माता लक्ष्मी बाई और पिता श्रवण चढोकार के यहाँ मध्यप्रदेश के जिला बैतूल में हुआ। नाम रखा गया दुर्गादास।
बालावस्था से ही इस बालक में कुछ अनौखी बातें देखने में आती थीं। यह हमउम्र बालकों की तरह उत्साहित एवं चपल नहीं था, अपितु बड़ों-बुजुर्गों की तरह बहुत गंभीर रहता था।
यह बालक अपनी किसी भी बात या उपलब्धि से प्रसन्न नहीं होता था, जबकि इसके विपरीत माता-पिता, भाई-दोस्त यहाँ तक कि शिक्षक भी उसकी उपलब्धियों एवं उन्नति से प्रसन्न होते थे लेकिन दुर्गादास नहीं।
उसे हमेशा लगता कि वह यह सब करने के लिए नहीं जन्मा है। हालांकि उसे क्या करना है, यह भी उसे स्पष्ट समझ नहीं आता था।
उसका एक ही साथी था…….
सेवाओं की सेवा प्रकृति की सेवा
सेवा का भाव और सनातन संस्कृति
सेवा का भाव प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। सनातन धर्म में सेवा को धर्म का सार माना गया है। प्राणी मात्र और प्रकृति की सेवा का भाव पूजा-पद्धति और मान्यताओं में समाहित है। मानव की सेवा माधव की सेवा के समान है। कहा गया है कि –
“मनुष्य की सेवा करने वाले हाथ उतने ही धन्य होते हैं, जितने परमात्मा की प्रार्थना करने वाले अधर।”
इसलिए सेवा ही मानव जीवन का वास्तविक सौंदर्य और श्रृंगार है।
पंचमहाभूत और प्रकृति का संतुलन
हमारे शरीर और ब्रह्मांड की रचना पंचमहाभूतों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – से हुई है।
शास्त्रों में कहा गया है –
“यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे”
अर्थात् जैसे शरीर में, वैसे ही ब्रह्मांड में।
जब इन पंचमहाभूतों में असंतुलन उत्पन्न होता है, तो:
शरीर में व्याधियाँ जन्म लेती हैं।
और प्रकृति में आपदाएँ घटित होती हैं।
वास्तव में अधिकांश प्राकृतिक आपदाएँ मानवजनित हैं।
गीता और मानसिक प्रदूषण
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में पंचमहाभूतों के अतिरिक्त तीन और तत्व बताए – मन, बुद्धि और अहंकार।
ये हमारे मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक प्रदूषण को प्रभावित करते हैं। इसलिए पर्यावरणीय संतुलन केवल भौतिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक भी है।
वेदों का शांति संदेश
यजुर्वेद में कहा गया है:
“ऊँ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षॅ शान्तिः, पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः,
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्व शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः,
सा मा शान्तिरेधि. ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥”
(अर्थ: हे प्रभु! आकाश, पृथ्वी, जल, औषधियों, वनस्पतियों और समस्त ब्रह्मांड में शांति हो। जीव मात्र के तन-मन और कण-कण में शांति हो।)
हम शांति पाठ का उच्चारण तो करते हैं, पर व्यवहार में प्रकृति को हानि पहुँचाने वाले कर्म ही करते हैं।
वायु और वृक्ष संरक्षण
वेदों में वायु को प्राण कहा गया है।
शरीर में प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान – पाँच प्रकार की वायु प्रवाहित होती है।
प्राणवायु का प्रमुख स्रोत वनस्पति है।
सनातन संस्कृति में वायु शुद्धि हेतु यज्ञ और होम की परंपरा है।
हमारे मनीषियों ने वृक्षों को सजीव माना और काटना पाप बताया।
सबसे उपयोगी वृक्ष – पीपल, बरगद और बेल – को काटना महापाप माना गया है, क्योंकि पीपल सबसे अधिक प्राणवायु उत्सर्जित करता है।
सेवा और धर्म का सार
ईश्वर को प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता, लेकिन पंचमहाभूत हमारे सामने हैं। उनकी उपेक्षा कर हम ईश्वर की कृपा के अधिकारी नहीं हो सकते।
इसलिए:
प्रकृति का संरक्षण,
प्राणी मात्र की रक्षा, और
मानवता की सेवा
यही वास्तविक धर्म है।
सेवा भावना ही मानव जीवन की पूर्णता है और यही सनातन धर्म का सार है।
पंचतत्व
हिन्दू धर्म के अनुसार हमारा ब्रह्मांड, धरती, जीव, जंतु, प्राणी और मनुष्य सभी का निर्माण आठ तत्वों से हुआ है। इन आठ तत्वों में से पांच तत्व को हम सभी जानते हैं। आओ जानते हैं पांच तत्व क्या है।
हिन्दू धर्म के अनुसार इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति क्रम इस प्रकार है- अनंत-महत्-अंधकार-आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी। अनंत जिसे आत्मा कहते हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह प्रकृति के आठ तत्व हैं। उक्त सभी की उत्पत्ति आत्मा या ब्रह्म की उपस्थिति के कारण है।
आकाश के पश्चात वायु, वायु के पश्चात अग्नि, अग्नि के पश्चात जल, जल के पश्चात पृथ्वी, पृथ्वी से औषधि, औषधियों से अन्न, अन्न से वीर्य, वीर्य से पुरुष अर्थात शरीर उत्पन्न होता है।- तैत्तिरीय उपनिषद
पंच तत्व को समझें और सम्मान करे
1. पृथ्वी तत्व
इसे जड़ जगत का हिस्सा कहते हैं। हमारी देह जो दिखाई देती है वह भी जड़ जगत का हिस्सा है और पृथ्वी भी। इसी से हमारा भौतिक शरीर बना है, लेकिन उसमें तब तक जान नहीं आ सकती जब तक की अन्य तत्व उसका हिस्सा न बने। जिन तत्वों, धातुओं और अधातुओं से पृथ्वी बनी है उन्हीं से यह हमारा शरीर भी बना है।
2. जल तत्व
जल से ही जड़ जगत की उत्पत्ति हुई है। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल विद्यमान है उसी तरह जिस तरह की धरती पर जल विद्यमान है। जितने भी तरल तत्व जो शरीर और इस धरती में बह रहे हैं वो सब जल तत्व ही है। चाहे वो पानी हो, खून हो, वसा हो, शरीर में बनने वाले सभी तरह के रस और एंजाइम।
3. अग्नि अत्व
अग्नि से जल की उत्पत्ति मानी गई है। हमारे शरीर में अग्नि ऊर्जा के रूप में विद्यमान है। इस अग्नि के कारण ही हमारा शरीर चलायमान है। अग्नि तत्व ऊर्जा, ऊष्मा, शक्ति और ताप का प्रतीक है। हमारे शरीर में जितनी भी गर्माहट है वो सब अग्नि तत्व ही है। यही अग्नि तत्व भोजन को पचाकर शरीर को निरोगी रखता है। ये तत्व ही शरीर को बल और शक्ति वरदान करता है।
4. वायु तत्व
वायु के कारण ही अग्नि की उत्पत्ति मानी गई है। हमारे शरीर में वायु प्राणवायु के रूप में विद्यमान है। शरीर से वायु के बाहर निकल जाने से प्राण भी निकल जाते हैं। जितना भी प्राण है वो सब वायु तत्व है। धरती भी श्वांस ले रही है। वायु ही हमारी आयु भी है। जो हम सांस के रूप में हवा (ऑक्सीजन) लेते हैं, जिससे हमारा होना निश्चित है, जिससे हमारा जीवन है। वही वायु तत्व है।
5. आकाश तत्व
आकाश एक ऐसा तत्व है जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु विद्यमान है। यह आकाश ही हमारे भीतर आत्मा का वाहक है। इस तत्व को महसूस करने के लिए साधना की जरूरत होती है। ये आकाश तत्व अभौतिक रूप में मन है। जैसे आकाश अनन्त है वैसे ही मन की भी कोई सीमा नहीं है। जैसे आकाश में कभी बादल, कभी धूल और कभी बिल्कुल साफ होता है वैसे ही मन में भी कभी सुख, कभी दुख और कभी तो बिल्कुल शांत रहता है। ये मन आकाश तत्व रूप है जो शरीर मे विद्यमान है।
इन पंच तत्व से ऊपर एक तत्व है जो आत्मा (ॐ) है। जिसके होने से ही ये तत्व अपना काम करते हैं।
इन्ही पांच तत्वों को सामूहिक रूप से पंचतत्व कहा जाता है। इनमें से शरीर में एक भी न हो तो बाकी चारों भी नहीं रहते हैं। किसी एक का बाहर निकल जाने ही मृत्यु है। आत्मा को प्रकट जगत में होने के लिए इन्हीं पंच तत्वों की आवश्यकता होती है।
जो मनुष्य इन पंच तत्वों के महत्व को समझकर इनका सम्मान और इनको पोषित करता है वह निरोगी रहकर दीर्घजीवी होता है।
आकाश तत्व के स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। यह तत्व प्रेम और मन से संबंध रखता है। आकाश एक ऐसा तत्व है जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु सभी समाहित हैं। इसे आत्मा का वाहक भी कहा गया है। आकाश तत्व अभौतिक रूप में मन के रूप में विद्यमान है। जैसे आकाश अनन्त और असीम है, वैसे ही मन की भी कोई सीमा नहीं है। आकाश कभी बादलों से ढक जाता है, कभी धूल से भर जाता है और कभी बिल्कुल साफ़ हो जाता है; ठीक वैसे ही मन भी कभी सुख, कभी दुःख और कभी शांति की अवस्था में रहता है।
मानव शरीर में आकाश तत्व संतुलन का कार्य करता है। व्यक्ति के मुख से निकलने वाली वाणी और मस्तिष्क में बनने वाले शब्द इसी तत्व से उत्पन्न होते हैं। मन में भावनाएं और दिमाग में विचारों का प्रवाह आकाश तत्व के कारण ही संभव होता है। वास्तु शास्त्र में आकाश तत्व को सीमा और कनेक्टिविटी का प्रतीक माना गया है। यह विचारों, भावनाओं, ज्ञान-विकास, रिश्तों और आनंदमय जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। व्यापार, सूचना, प्रणाली, शक्ति और सहयोग की वृद्धि भी आकाश तत्व के अधीन है। वास्तु में आकाश तत्व का प्रभाव पश्चिम दिशा पर माना गया है। साथ ही, यह सुनने की क्षमता भी प्रदान करता है।
महर्षि वशिष्ठ ने आकाश को तीन रूपों में बताया है – चित्ताकाश, चिदाकाश और माकाश। चित्ताकाश मन और विचारों का आकाश है, चिदाकाश ज्ञान और आत्मस्वरूप का आश्रय है तथा माकाश भौतिक आकाश है। इन तीनों रूपों में चिदाकाश सबसे सूक्ष्म है, जिसमें स्थिर होकर आत्मा परम तत्त्व की प्राप्ति कर सकती है। यही कारण है कि आकाश तत्व को ईश्वरीय सत्ता के अत्यंत समीप माना गया है।
आकाश तत्व की व्याख्या वैज्ञानिक दृष्टि से भी होती है। पृथ्वी आयन मण्डल से घिरी हुई है, जिसमें इलेक्ट्रॉन और विद्युत कणों की परतें पाई जाती हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हें “ई”, “डी” और “एफ” परतों में विभाजित किया है। सूर्य की ऊर्जा इन इलेक्ट्रॉनों को प्रभावित करती है और परिणामस्वरूप यह परतें पृथ्वी की जलवायु तथा मानव के मन और गुणों पर भी असर डालती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आकाश तत्व न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत गूढ़ और प्रभावशाली है।
आकाश तत्व ईश्वरीय सत्ता के सबसे समीप माना जाता है। इसमें समस्त सृष्टि की व्यापकता समाहित है। यह तत्व मानव के मन, विचार, भावनाओं, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का आधार है।
सनातन शास्त्रों के अनुसार वायु तत्व माता पार्वती के अधीन माना गया है। धन-सम्पदा और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए माँ पार्वती की उपासना विशेष फलदायी होती है। वायु तत्व को प्राण का आधार कहा गया है, क्योंकि हमारे शरीर में वायु ही प्राणवायु के रूप में विद्यमान रहती है। जब शरीर से यह वायु बाहर निकल जाती है, तब प्राण भी निकल जाते हैं। यही कारण है कि वायु को ही आयु और जीवन का आधार कहा गया है।
वेदों और उपनिषदों में वायु को देवत्व प्राप्त है। शरीर की गति और स्पर्श की शक्ति वायु तत्व से ही आती है। प्राणों को प्राणवायु कहने का कारण भी यही है कि सम्पूर्ण प्राण शक्ति वायु पर ही टिकी है। धरती स्वयं भी श्वास लेती है और सम्पूर्ण जीव-जगत इसी वायु से जीवन प्राप्त करता है। शास्त्रों में वायु तत्व को गति, प्रेरणा और जीवन ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। यह समाज में व्यक्ति की स्थिति को आकार देता है तथा दूसरों को प्रेरित करने की शक्ति प्रदान करता है।
वास्तु और धर्मशास्त्र के अनुसार वायु तत्व का प्रभाव उत्तर-पश्चिम दिशा पर अधिक होता है। जब वायु तत्व संतुलित अवस्था में रहता है, तो व्यक्ति साहसपूर्वक नए कार्यों को अपनाता है, अपने विकास हेतु उचित जोखिम उठाता है और आत्म-खोज में आगे बढ़ता है। यह तत्व जीवन में ताजगी, आनंद और उत्साह लाता है। किंतु यदि वायु असंतुलित हो जाए तो व्यक्ति में हठ, क्रोध, अस्थिरता, समाज और पड़ोस के साथ विवाद, तथा जीवन में बाधाओं का अनुभव होने लगता है।
आयुर्वेद के अनुसार वायु तत्व के असंतुलन से शरीर में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। इससे त्वचा विकार, जोड़ों में पीड़ा, वात रोग और मानसिक उदासी प्रकट होती है। यहाँ तक कि यौन असंतोष जैसी स्थिति भी वायु दोष के कारण मानी गई है। इस प्रकार शास्त्रों में वायु तत्व को जीवन और स्वास्थ्य दोनों का आधार बताया गया है।
अग्नि तत्व के देवता
सूर्य देव और मंगल ग्रह अग्नि तत्व के स्वामी माने जाते हैं।
सूर्य देव निरोगी जीवन, तेजस्विता और ऊर्जा के दाता हैं।
मंगल शक्ति, पराक्रम और उत्साह का दाता है।
1. अग्नि की उत्पत्ति
ऋग्वेद में अग्नि को “जलज” कहा गया है अर्थात् अग्नि की उत्पत्ति जल से मानी गई है।
पुराणों में अग्नि को सूर्य से उत्पन्न बताया गया है।
इसीलिए अग्नि और जल दोनों जीवन के लिए अनिवार्य हैं और संतुलन में रहते हैं।
ऋग्वेद में अग्नि को प्रथम देवता के रूप में आवाहन किया गया है – “अग्निमीले पुरोहितं…” से वेद का आरंभ होता है।
पुराणों में कहा गया है कि अग्नि की उत्पत्ति सूर्य से हुई।
महाभारत (वनपर्व) में उल्लेख है कि अग्नि का जन्म जल से हुआ है।
अग्नि को ब्रह्मा का मुख, विष्णु का तेज, और रुद्र का स्वरूप माना गया है।
2. अग्नि का स्वरूप और प्रतीक
ऊर्जा, शक्ति और ताप का प्रतीक।
अग्नि का रंग लाल व सुनहरा माना गया है।
अग्नि का वाहन मेष (भेड़ा) बताया गया है।
अग्नि के हाथ में हवन कुंड व लौ मानी गई है।
3. अग्नि के प्रकार
शास्त्रों में अग्नि के 49 प्रकार बताए गए हैं, जो मुख्य रूप से सात अग्नियों के अंतर्गत आते हैं:
सप्त जठराग्नि – (पाचन शक्ति की अग्नि)
सप्त भूताग्नि – (पंचतत्वों में विद्यमान अग्नि)
सप्त वेदाग्नि – (वेद व यज्ञ में प्रयुक्त अग्नि)
सप्त दिव्याग्नि – (देवताओं के लिए)
सप्त दैत्याग्नि – (असुरों से संबंधित अग्नि)
सप्त पितृाग्नि – (पितरों के तर्पण हेतु)
सप्त लौकिक अग्नि – (मानव जीवन में प्रयुक्त अग्नि)
इस प्रकार 7×7 = 49 अग्नियाँ।
4. अग्नि और जीवन के संस्कार
हिंदू जीवन में अग्नि का महत्व जन्म से मृत्यु तक है:
जन्म पर – शिशु को अग्नि देव के समक्ष आशीर्वाद दिया जाता है।
उपनयन संस्कार – अग्निहोत्र और वेदपाठ अग्नि के साक्षी में होता है।
विवाह संस्कार – अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं।
यज्ञ-हवन – देवी-देवताओं को आहुतियाँ अग्नि द्वारा दी जाती हैं।
अंत्येष्टि (दाह संस्कार) – अग्नि द्वारा ही आत्मा को पवित्र मार्ग पर भेजा जाता है।
5. अग्नि और देवताओं से संबंध
वेदों में अग्नि को देवताओं और मनुष्यों के बीच संदेशवाहक (दूत) कहा गया है।
सभी यज्ञों और हवनों में अग्नि ही वह माध्यम है जिसके जरिए देवता आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।
कहा गया है – “यज्ञ का फल अग्नि देवता ही देवताओं तक पहुंचाते हैं।”
6. ज्योतिष शास्त्र में अग्नि (Agni in Astrology)
सूर्य और मंगल अग्नि प्रधान ग्रह हैं।
अग्नि तत्व प्रधान राशि: मेष, सिंह, धनु।
इनसे व्यक्ति में ऊर्जा, साहस, नेतृत्व, और तेजस्विता आती है।
7. शरीर में अग्नि
आयुर्वेद और योग शास्त्र के अनुसार:
जठराग्नि – भोजन पचाने वाली अग्नि।
भूताग्नि – पंच तत्वों में कार्यरत अग्नि।
धात्वाग्नि – शरीर के सात धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) को पचाने वाली अग्नि।
कुण्डलिनी अग्नि – योग साधना में मूलाधार चक्र में स्थित।
8. दार्शनिक महत्व
अग्नि को ज्ञान का प्रकाश कहा गया है।
अज्ञान का अंधकार केवल ज्ञान-अग्नि से ही नष्ट होता है।
भगवद्गीता (4.37) में श्रीकृष्ण कहते हैं –
“ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा।”
अर्थात् – ज्ञान रूपी अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है।
9. अग्नि और पर्यावरण
अग्नि न केवल आध्यात्मिक बल्कि पर्यावरणीय संतुलन का भी अंग है।
अग्नि से ऊर्जा प्राप्त होती है, लेकिन इसका दुरुपयोग (जैसे प्रदूषण, जंगल की आग) विनाशकारी है।
शास्त्रों में अग्नि का प्रयोग संतुलित व नियंत्रित रूप में ही करने का आदेश है।
10. अग्नि तत्व का मानसिक प्रभाव
अग्नि तत्व विवेक, दृष्टि और आत्मविश्वास देता है।
अधिक अग्नि → क्रोध, चिड़चिड़ापन, उग्रता।
संतुलित अग्नि → जुनून, परिश्रम, साहस, आत्मविश्वास।
कम अग्नि → आलस्य, निराशा, कमजोरी।
पंचतत्व और जल का महत्व
शास्त्रों के अनुसार हमारा शरीर पंचतत्वों से निर्मित है – जल, अग्नि, आकाश, पृथ्वी और वायु। इन प्रत्येक तत्वों का संबंध एक-एक देवता से है और जीवन की आधारभूत शक्तियाँ इन्हीं के माध्यम से संतुलित रहती हैं।
जल तत्व – इसके अधिपति भगवान शिव माने गए हैं। जल तत्व ज्ञान, शांति और आत्मिक शुद्धि का स्रोत है।
अग्नि तत्व – इसके देवता सूर्य भगवान हैं। अग्नि से ही शरीर का स्वास्थ्य और ऊर्जा संबंध रखती है।
आकाश तत्व – इसके स्वामी भगवान विष्णु हैं। यह तत्व प्रेम, विस्तार और अनंतता का प्रतीक है।
पृथ्वी तत्व – इसके अधिपति श्रीगणेश हैं। यह स्थायित्व और विघ्ननाश का द्योतक है।
वायु तत्व – माता पार्वती इसके अधीन हैं। यह तत्व जीवन में गति, समृद्धि और उन्नति प्रदान करता है।
जल का जीवन में महत्व
वेदों में जल को “जल जीवन का पालक” कहा गया है। प्राणवायु जीव की विविध क्रियाओं को सक्रिय करती है, किन्तु इन क्रियाओं का आधार जल ही है। यही कारण है कि जल को जीवन का मूलाधार कहा गया है।
भगवान शिव महापुराण (उमासंहिता) में शंकर जी माता पार्वती से कहते हैं:
“आकाश से वायु उत्पन्न होती है, वायु से तेज, तेज से जल और जल से पृथ्वी।”
इस प्रकार पंचभूत एक-दूसरे में विलीन होते हैं और सृष्टि का आधार बनते हैं।
वैदिक काल से लेकर आज तक सभ्यता का विकास नदियों और जलस्रोतों के किनारे ही हुआ है। गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी जैसी नदियाँ जीवनदायिनी शक्ति मानी जाती हैं। स्नान के समय आज भी यह मंत्र उच्चारित होता है –
“गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु॥”
हिंदू जीवन के सभी संस्कारों – जन्म से मृत्यु तक – जल के बिना पूर्ण नहीं होते। चाहे संकल्प लेना हो, आचमन करना हो या पवित्र मार्जन करना हो, प्रत्येक में जल ही माध्यम है।
वैदिक साहित्य और जल
ऋग्वेद में कहा गया है कि इस पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति अपः (जल) से हुई। जल को शीतल, शुद्ध, शिवमय और जीवनदायी बताया गया है।
सिंधु घाटी सभ्यता में जल-प्रबंधन और स्वच्छता का अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है – ढकी हुई नालियाँ, कुएँ और जलस्रोत वहाँ की वैज्ञानिक दृष्टि को दर्शाते हैं।
बृहत्संहिता और सुश्रुत संहिता में जल शोधन के विविध उपाय बताए गए हैं। औषधीय पौधों और रत्नों के माध्यम से जल को शुद्ध रखने की परंपरा प्राचीन काल से रही है।
पुराणों में जल की महिमा
पुराणों में जल को पवित्र करने वाला, पाप नाशक और तन–मन को निर्मल करने वाला कहा गया है।
शुद्ध जल जहाँ रोगों से रक्षा करता है, वहीं पवित्र जल आत्मिक शांति और आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है।
आज भी कथा-यज्ञों में कलश-स्थापना कर पवित्र जल रखा जाता है और पूर्णाहुति के पश्चात उस जल को प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। यह जल न केवल ऊर्जा का वाहक है, बल्कि सकारात्मक शक्ति का संवाहक भी है।
वर्तमान संदर्भ
धरती पर उपलब्ध जल का अधिकांश भाग खारे समुद्री जल के रूप में है। मानव उपयोग हेतु उपलब्ध मीठा जल अत्यंत सीमित है। दुर्भाग्य से शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और जनसंख्या वृद्धि ने जल स्रोतों को प्रदूषित कर दिया है। नदियाँ गंदगी और अपशिष्ट से भर गई हैं।
इसलिए आज आवश्यकता है कि हम जल संरक्षण की प्राचीन परंपराओं से प्रेरणा लेकर नए उपाय अपनाएँ।
निष्कर्ष
पंचतत्वों में जल को सर्वाधिक पवित्र और जीवनदायी माना गया है। यह न केवल शरीर के स्वास्थ्य और जीवन की क्रियाओं का आधार है, बल्कि आत्मिक और आध्यात्मिक शांति का भी स्रोत है।
शास्त्रों, वेदों और पुराणों में जल को दिव्यता का प्रतीक बताकर उसके संरक्षण और शुद्धता पर बल दिया गया है।
जल ही जीवन है।
सनातन धर्म और वैदिक शास्त्रों में पंचमहाभूतों का अत्यंत गहरा महत्व है। इन पंच तत्वों – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी – में से पृथ्वी तत्व को आधारभूत और स्थायित्व देने वाला तत्व माना गया है। संपूर्ण सृष्टि की संरचना में पृथ्वी तत्व ही ऐसा है, जो दृश्यमान और ठोस रूप में हमें दिखाई देता है।
इसी कारण इसे जड़ जगत का हिस्सा कहा जाता है। जो शरीर हमें दिखाई देता है, जो पर्वत, वनस्पति, खनिज, मिट्टी और जीव-जंतु हमें घेरते हैं, सबका मूल आधार यही पृथ्वी तत्व है।
शास्त्रों में पृथ्वी को “धरणी” और “भूमि देवी” के नाम से पुकारा गया है, जो संपूर्ण जीवन को धारण करने वाली शक्ति है।
अधिष्ठाता देवता
पृथ्वी तत्व के अधिष्ठाता देवता गणेश जी बताए गए हैं।
गणेशजी विघ्नहर्ता और स्थायित्व देने वाले देवता हैं।
जीवन में स्थायित्व, दृढ़ता और विघ्न नाश के लिए गणेशजी की उपासना की जाती है।
प्रत्येक शुभ कार्य की शुरुआत गणेश वंदना से ही होती है, क्योंकि बिना स्थिरता और संतुलन के कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता।
वास्तु शास्त्र और पुराणों में गणेशजी के साथ-साथ राहु को भी पृथ्वी तत्व से संबंधित माना गया है।
राहु नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) के स्वामी हैं।
इस दिशा का संबंध स्थायित्व और दीर्घकालिक सुरक्षा से है।
जब इस दिशा का संतुलन बिगड़ता है, तो जीवन में अस्थिरता, विवाद और संकट उत्पन्न होते हैं।
ज्योतिष शास्त्र और पृथ्वी तत्व
ज्योतिष शास्त्र में भी पृथ्वी तत्व का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
वृषभ, कन्या और मकर राशियाँ – पृथ्वी तत्व की राशियाँ मानी जाती हैं।
इन राशियों के जातक गंभीर, स्थिर, धैर्यवान और व्यवहारिक स्वभाव के होते हैं।
वे हर कार्य को ठोस आधार पर करना पसंद करते हैं और जल्दबाज़ी से बचते हैं।
यह गुण सीधे-सीधे पृथ्वी तत्व के प्रभाव का परिचायक है।
मानव शरीर और पृथ्वी तत्व
मानव शरीर और पृथ्वी तत्व का संबंध अत्यंत गहरा है। हमारी देह वास्तव में पृथ्वी का ही अंश है।
शास्त्रों में कहा गया है –
“यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे”
(जैसे ब्रह्माण्ड है, वैसे ही मानव शरीर है)।
ब्रह्माण्ड की संरचना पंचमहाभूतों से हुई है, वैसे ही हमारा शरीर भी इन्हीं तत्वों से बना है।
पृथ्वी तत्व से शरीर की हड्डियाँ, मांसपेशियाँ, माँस, त्वचा और कोशिकाएँ निर्मित होती हैं।
शरीर का स्थूल और दृश्यमान रूप पृथ्वी तत्व के बिना संभव नहीं।
शरीर की सुंदरता, कठोरता और स्थिरता भी इसी तत्व से आती है।
शास्त्र कहते हैं कि शरीर के नाभि से नीचे के अंग विशेष रूप से पृथ्वी तत्व के नियंत्रण में होते हैं।
पृथ्वी तत्व के गुण
शास्त्रों में पृथ्वी तत्व को निम्न गुणों का प्रतीक माना गया है:
स्थिरता
संतुलन
धैर्य
कठोरता
दृढ़ता
तप
सहनशीलता
जिस प्रकार धरती माता अनंत धैर्य से सबको सहन करती हैं और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराती हैं, उसी प्रकार यह तत्व व्यक्ति में धैर्य और तपस्या की शक्ति भरता है।
यह देने की क्षमता प्रदान करता है और शरीर, विचारों, संबंधों तथा जीवन से अपशिष्ट को हटाने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
👉 शास्त्रों में कहा गया है –
जो साधक पृथ्वी तत्व पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह तपस्वी और स्थिरचित्त हो जाता है।
पृथ्वी तत्व की मुख्य भूमिकाएँ
धरती माता – सभी को जीवन के लिए अन्न, जल, औषधि, खनिज, धातुएँ व आश्रय देती है।
बीज अंकुरण – पृथ्वी तत्व ही नियंत्रित करता है, जिससे कृषि और जीवन चक्र चलता है।
जड़ जगत – पर्वत, मिट्टी, खनिज, वनस्पति आदि सभी इसी तत्व से बने हैं।
शरीर-प्रकृति का निर्माण – जैसे पृथ्वी विभिन्न धातुओं व तत्वों से बनी है, वैसे ही मानव शरीर भी उन्हीं से निर्मित है।
संतुलन – पर्यावरण में पृथ्वी तत्व के संतुलन से धरती पर जीवन का स्थायित्व और समृद्धि बनी रहती है।
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“जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान होता है।”
कुछ ऐसे ही लोगों का दर्द शायद मेरे द्वारा ईश्वरीय प्रेरणा से बयाँ होना था। दूसरों का दर्द समझना और उस दर्द को सहानुभूति पूर्वक बाँटना मानवता की पहली निशानी है।
“वैष्णव जन तो तेने कहिये जो पीर पराई जाणे रे…”
असली वैष्णव वह है जो दूसरे के दुख को जानता है। एक-दूसरे के दुख को समझना, बाँटना व सहयोग करना प्रत्येक धरतीवासी का कर्तव्य है।
क्योंकि वेद कहते हैं –
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
यह भूमि माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ अर्थात सारी धरती के प्राणी पृथ्वी की संतानें हैं। इस नाते सब भाई-बंधु हुए, सो सबको एक-दूसरे का ध्यान रखना चाहिए।
यह पुस्तक एक ऐसे पीड़ित वर्ग के दर्द को शब्दों में प्रकट करती चीख-पुकार है, जो सदियों से हमारे बीच गुलामी और उपहास की ज़िन्दगी जी रहे हैं।
उस वर्ग की जबान है, परंतु उस पर सदियों की दासता की जमीं धूल भारी पड़ रही है। वह एकजुट संगठन शक्ति का स्वामी है, परंतु शक्ति प्रदर्शन की उसकी वह क्षमता उसकी निरक्षरता के कारण बर्फ की तरह जमी पड़ी है।
इस दुखभरी कहानी के उस पात्र का नाम है – “हिजड़ा”, जिसे “छक्का” या “किन्नर” कहकर भी अपमानित किया जाता है।
समाज और किन्नर
मानवतावादी सोच की इस 21वीं सदी में जहाँ कुत्ते-बिल्लियाँ लेकर वन्य प्राणी, वनस्पति, वन, पर्वत, पर्यावरण, जल इत्यादि सभी के प्रति मनुष्य ने मानवता रूपी अपनी आवाज उठाई है, वहीं उन्हीं के बीच सदियों से समाज की उपेक्षा, प्रताड़ना, बेइज्जती को सहन करता किन्नर समाज का एक बड़ा वर्ग सारी दुनिया की नजरों से ओझल दिखाई पड़ रहा है।
आखिर प्रश्न उठता है कि हर बार उसी वर्ग की पीड़ा व हक को अनदेखा क्यों किया जाता है? जबकि उसे इतिहास में बड़े सम्मान का दर्जा प्राप्त था।
5000 वर्षों की उपेक्षा
गत 5000 वर्षों में उसकी जो दुर्दशा, दुर्गति और अवमानना हुई है, शायद दुनिया में किसी अन्य वर्ग की इतनी नहीं हुई होगी।
आज जहाँ चारों ओर समृद्धि, विकास और मानवाधिकार को पाने की बात समस्त सृष्टि के जीवों हेतु हो रही हो, वहाँ भी इसका कोई वजूद न देखकर दुख के साथ हैरानी भी होती है कि इस लाचार अनपढ़ जोंकर (हिजड़ा) की ओर मानवता के हाथ कब मदद के लिए उठेंगे।
5000 वर्ष पूर्व खोया उसका सम्मान व वजूद कब लौटकर आएगा?
धर्म और किन्नर
संसार में जब भी मानव जाति की बात उठती है, तो उसके साथ धर्म की बात उठना स्वाभाविक है।
क्योंकि धर्म मनुष्य के लिए ही बना है। धर्म की जड़ मनुष्य की उत्पत्ति से पूर्व की मानी गई है। मनुष्य बिना धन के जी सकता है, किंतु बिना धर्म के नहीं।
मनुष्य में एक ओर जहाँ हिंसा कूट-कूटकर भरी हुई है, वहीं दूसरी ओर अहिंसा भी विद्यमान है। सच और झूठ के इस तराजू का काँटा मन पर कभी दाएँ तो कभी बाएँ प्रभाव व दबाव डालता है।
संसार का सबसे प्राचीन धर्म सनातन धर्म माना गया है।
किन्नर और सनातन धर्म
सनातन धर्म में त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव को क्रमशः सृष्टि के रचयिता, पालक एवं संहारक कहा गया है।
शिव के अनेकों स्वरूपों का बखान शास्त्रों में आता है। शिव का प्रतीकात्मक स्वरूप शिवलिंग है, जिसका हिन्दू धर्म में अत्यधिक पूजन होता है।
शिवलिंग को दो शक्तियों से निर्मित माना गया है। विज्ञान के दृष्टिकोण से यह (+ एवं –) धनात्मक एवं ऋणात्मक रूपी ब्रह्मांडीय विद्युत शक्तियों का प्रतीक है।
शिवलिंग स्वरूप सृष्टि में धनात्मक एवं ऋणात्मक रूपों में विभक्त होकर आपस में क्रियाशील होता है, जिससे सृष्टि का निर्माण एवं संचालन होता है।
इसी कारण आदि शिव को अर्धनारीश्वर भी कहा जाता है।
शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप और किन्नर
शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप में स्त्री एवं पुरुष दोनों के अर्धभाग को नख से शिख तक एकात्मक रूप से प्रदर्शित किया है। शिव के इस अर्धनारीश्वर स्वरूप को सारे हिन्दू पूजते हैं।
परंतु वहीं समाज के भीतर समाज द्वारा ही उत्पन्न एक ऐसी जाति जिसमें इन दोनों गुणों का मेल माना जाता है – जिसे हम “किन्नर” या “हिजड़ा” कहते हैं – उसे अपमानित किया जाता है।
जो अदृश्य है उसका सम्मान, किंतु जो व्यक्त है उसका अपमान। यह कैसी समझदारी है?
किन्नर का उल्लेख रामायण में
हिन्दू धर्म में रामायण का अति विशिष्ट स्थान रहा है। इसी रामायण ग्रंथ में अनेकों स्थानों पर “किन्नर” शब्द का प्रयोग मिलता है।
रामजी के जीवनकाल में:
देव, दानव, नर, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व आदि के साथ किन्नरों का भी उल्लेख हुआ है।
रामायण बालकांड में तुलसीदास जी लिखते हैं:
“देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्व।
बंदउ किन्नर रजनि चर कृपा करहु अब सर्व।।”
यहाँ देवता, नर, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, दानव इत्यादि के साथ किन्नरों को भी प्रणाम किया गया है।
माघ मेला और किन्नर
जब मकर संक्रांति पर प्रयागराज तीर्थ में माघ मेला लगता था, तब तुलसीदास जी लिखते हैं:
“माघ मकर रवी जब होई।
ति रथ पति हिं आव सब कोई।।
देव दनुज किन्नर नर श्रेणी।
सादर मजहि सकल त्रिवेणी।।”
अर्थात स्नान हेतु सबके साथ किन्नरों का भी आगमन होता था।
महाभारत और किन्नर
महाभारत काल में भी किन्नर समाज अपने बीच समानता के अधिकार से सम्मानित था।
भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण श्रीखंडी (हिजड़ा) बने। वास्तव में श्रीखंडी, राजकुमारी अम्बा का पुनर्जन्म था।
पांडवों के अज्ञातवास काल में अर्जुन “बृहन्नला” नामक हिजड़े के रूप में रहे और राजा विराट की पुत्री को संगीत की शिक्षा दी।
इससे स्पष्ट होता है कि उस काल में भी हिजड़ों को समाज में कला एवं अन्य सभी सामाजिक पहलुओं में समान अधिकार था।
माँ नर्मदा महिमा और परिक्रमा
1. नर्मदा का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में नर्मदा नदी का विशेष स्थान है।
देवों के देव महादेव की पुत्री होने के कारण उन्हें शांकरी, रुद्रदेह, रेवा, मेकलसुता आदि नामों से पुकारा जाता है।
नर्मदा पुराण में उल्लेख है कि गंगा में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह माँ नर्मदा के केवल दर्शन से ही प्राप्त हो जाता है।
वायु पुराण के अनुसार शिव के तांडव से निकले पसीने से नर्मदा की उत्पत्ति हुई।
स्कन्द पुराण के अनुसार शिव की तपस्या के दौरान निकले पसीने की बूंद से यह पावन धारा प्रवाहित हुई।
नर्मदा जयंती हर वर्ष माघ शुक्ल सप्तमी को मनाई जाती है।
2. उद्गम और प्रवाह
नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक (मध्यप्रदेश) है।
लगभग 1312 किमी बहने के बाद यह भरुच (गुजरात) में अरब सागर में मिलती है।
मध्यप्रदेश में इसका प्रवाह 1077 किमी है।
इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ तवा, हिरन, शेर, शक्कर, दुधी, गोई आदि हैं।
नर्मदा के तट पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है।
3. नर्मदा का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व
“नर्मदा के कंकर-कंकर में शंकर” की उक्ति प्रसिद्ध है।
नर्मदा तट पर अनेक आश्रम, तीर्थ और सिद्ध क्षेत्र हैं।
संतों का मानना है कि नर्मदा केवल जलधारा नहीं बल्कि जीवदायिनी और मोक्षदायिनी माता हैं।
4. नर्मदा और रोजगार
नर्मदा जल का उपयोग सिंचाई और ऊर्जा उत्पादन में भी होता है।
नर्मदा मास्टर प्लान (1972) के अंतर्गत बड़ी, मध्यम और लघु सिंचाई योजनाएँ बनीं।
प्रमुख परियोजनाएँ – इंदिरा सागर बांध, ओंकारेश्वर बांध, रानी अवंति बाई लोधी सागर बांध, सरदार सरोवर बांध।
नर्मदा परिक्रमा
1. परिक्रमा की विशिष्टता
भारत में अनेक नदियाँ हैं, परंतु केवल नर्मदा ही ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है।
इसका कारण यह है कि नर्मदा को जीवित देवी माना गया है।
अन्यत्र केवल तीर्थ की परिक्रमा होती है, परंतु यहाँ पूरी नदी की परिक्रमा करने की परंपरा है।
2. परिक्रमा की विधि
परिक्रमा अमरकंटक से आरंभ होकर एक किनारे से चलते हुए भरुच (गुजरात) में समुद्र संगम तक पहुँचती है।
फिर वहाँ से दूसरे किनारे से लौटकर पुनः अमरकंटक पहुँचने पर परिक्रमा पूर्ण होती है।
कुल दूरी लगभग 3500 किमी होती है।
3. नियम व व्रत
परिक्रमा व्रती प्रायः नंगे पैर चलते हैं।
भोजन भिक्षा या साधारण अन्न से होता है।
भूमि पर ही शयन और ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है।
परिक्रमा प्रायः 3 वर्ष, 3 माह और 13 दिन में पूर्ण होती है।
परिक्रमा व्रती को “नर्मदा परिक्रमावासी” कहा जाता है।
4. आध्यात्मिक महत्व
नर्मदा परिक्रमा करने से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
यह परिक्रमा साधक को परम शांति और मोक्ष की ओर ले जाती है।
निष्कर्ष
माँ नर्मदा केवल एक नदी नहीं हैं, बल्कि सनातन संस्कृति में शिवपुत्री, जीवदायिनी और मोक्षदायिनी माता के रूप में पूजनीय हैं। उनके तट पर स्थित तीर्थ, उनके जल का पान और उनकी परिक्रमा — ये सभी जीवन को पवित्र, कल्याणकारी और मोक्षदायी बना देते हैं।
नर्मदे हर
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग कम करने में हमारा योगदान
ग्लोबल वार्मिंग का मतलब है धरती का लगातार ज़रूरत से ज्यादा गर्म होते जाना। पिछले लगभग 140 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। सुनने में यह छोटा बदलाव लगता है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा है — हिमनदों का पिघलना, समुद्र का स्तर बढ़ना, बाढ़-सूखा जैसी आपदाओं में वृद्धि और इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों पर भी गंभीर खतरे।
इस समस्या का हल केवल सरकारों और वैज्ञानिकों पर नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि हम सभी अपनी रोज़मर्रा की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके इसमें योगदान दे सकते हैं।
नीचे कुछ प्रभावशाली तरीके दिए गए हैं जिनसे आप भी ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद कर सकते हैं:
1. पैदल चलना और साइकिल का प्रयोग
यदि आपका स्कूल, ऑफिस या बाज़ार पास में है, तो पैदल या साइकिल से जाएं।
इससे ईंधन की खपत कम होती है और प्रदूषण भी घटता है।
पैदल चलना आपके स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
2. सार्वजनिक परिवहन का उपयोग
जहाँ संभव हो वहाँ निजी गाड़ी की बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट (बस, ट्रेन, मेट्रो) का उपयोग करें।
एक ही वाहन में कई लोग सफर करते हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन काफी कम हो जाता है।
ट्रैफिक जाम और ईंधन खर्च दोनों घटते हैं।
3. ऊर्जा कुशल बल्ब (CFL/LED) का उपयोग
सीएफएल या एलईडी बल्ब साधारण बल्बों की तुलना में बहुत कम बिजली खर्च करते हैं।
ऊर्जा बचत = प्रदूषण में कमी।
बिजली बचाकर आप अपने बिजली बिल में भी कटौती कर सकते हैं।
4. बिजली की बचत
जरूरत न होने पर पंखे, लाइट, एसी बंद कर दें।
घर से बाहर निकलते समय सभी उपकरण स्विच ऑफ कर दें।
बिजली बचाना सीधा-सीधा कोयला और अन्य ईंधनों की खपत कम करना है, जिससे प्रदूषण कम होगा।
5. टीवी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सही ढंग से उपयोग करें 📺
कई बार टीवी या कंप्यूटर अनावश्यक रूप से चालू रहते हैं।
इन्हें बंद रखने से ऊर्जा और संसाधन बचते हैं।
उपकरणों की लाइफ भी बढ़ती है।
6. पेड़ लगाएँ और हरियाली बढ़ाएँ
एक पेड़ अपने जीवनकाल में हजारों किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकता है।
पेड़ हवा को शुद्ध करते हैं, छाया देते हैं और मिट्टी व जल संरक्षण में मदद करते हैं।
हर घर, गली, स्कूल और ऑफिस में पौधारोपण का अभियान चलाएँ।
7. शाकाहारी भोजन अपनाएँ
शोध बताते हैं कि मांस उत्पादन में अत्यधिक पानी, जमीन और ऊर्जा खर्च होती है।
पशुपालन से मीथेन गैस निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग को तेज़ी से बढ़ाती है।
शाकाहारी भोजन स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम है।
8. रिपेयर करवाएँ
कोई भी चीज़ खराब हो जाए तो तुरंत नई खरीदने की बजाय मरम्मत कराने का प्रयास करें।
इससे ई-वेस्ट (Electronic Waste) और प्लास्टिक कचरे की मात्रा घटती है।
संसाधनों का पुन: उपयोग होता है।
9. सेकेंड-हैंड सामान का उपयोग
यदि कोई चीज़ इस्तेमाल योग्य है, तो नया खरीदने से पहले सेकेंड-हैंड पर विचार करें।
इससे उत्पादन पर होने वाला प्राकृतिक संसाधनों का दबाव कम होगा।
“रीयूज़” करना पृथ्वी के लिए एक बड़ा सहयोग है।
10. रिसाइक्लिंग
पुरानी वस्तुओं जैसे प्लास्टिक, कांच, धातु और कागज को रिसाइकल करना चाहिए।
रिसाइक्लिंग से नए उत्पाद बनते हैं और वेस्ट की मात्रा घटती है।
यह प्रक्रिया ऊर्जा की खपत और प्रदूषण दोनों को कम करती है।
निष्कर्ष
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। इसका हल केवल बड़ी नीतियों या अंतरराष्ट्रीय समझौतों में नहीं छिपा है, बल्कि हमारी छोटी-छोटी आदतों में भी है।
यदि हम पैदल चलना, बिजली बचाना, पेड़ लगाना और रिसाइक्लिंग जैसी जिम्मेदारियाँ अपनाएँ, तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित पृथ्वी छोड़ सकते हैं।
याद रखें: “पृथ्वी हमारी नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है।”
“जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान होता है।”
कुछ ऐसे ही लोगों का दर्द शायद मेरे द्वारा ईश्वरीय प्रेरणा से बयाँ होना था। दूसरों का दर्द समझना और उस दर्द को सहानुभूति पूर्वक बाँटना मानवता की पहली निशानी है।
“वैष्णव जन तो तेने कहिये जो पीर पराई जाणे रे…”
असली वैष्णव वह है जो दूसरे के दुख को जानता है। एक-दूसरे के दुख को समझना, बाँटना व सहयोग करना प्रत्येक धरतीवासी का कर्तव्य है।
क्योंकि वेद कहते हैं –
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
यह भूमि माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ अर्थात सारी धरती के प्राणी पृथ्वी की संतानें हैं। इस नाते सब भाई-बंधु हुए, सो सबको एक-दूसरे का ध्यान रखना चाहिए।
यह पुस्तक एक ऐसे पीड़ित वर्ग के दर्द को शब्दों में प्रकट करती चीख-पुकार है, जो सदियों से हमारे बीच गुलामी और उपहास की ज़िन्दगी जी रहे हैं।
उस वर्ग की जबान है, परंतु उस पर सदियों की दासता की जमीं धूल भारी पड़ रही है। वह एकजुट संगठन शक्ति का स्वामी है, परंतु शक्ति प्रदर्शन की उसकी वह क्षमता उसकी निरक्षरता के कारण बर्फ की तरह जमी पड़ी है।
इस दुखभरी कहानी के उस पात्र का नाम है – “हिजड़ा”, जिसे “छक्का” या “किन्नर” कहकर भी अपमानित किया जाता है।
समाज और किन्नर
मानवतावादी सोच की इस 21वीं सदी में जहाँ कुत्ते-बिल्लियाँ लेकर वन्य प्राणी, वनस्पति, वन, पर्वत, पर्यावरण, जल इत्यादि सभी के प्रति मनुष्य ने मानवता रूपी अपनी आवाज उठाई है, वहीं उन्हीं के बीच सदियों से समाज की उपेक्षा, प्रताड़ना, बेइज्जती को सहन करता किन्नर समाज का एक बड़ा वर्ग सारी दुनिया की नजरों से ओझल दिखाई पड़ रहा है।
आखिर प्रश्न उठता है कि हर बार उसी वर्ग की पीड़ा व हक को अनदेखा क्यों किया जाता है? जबकि उसे इतिहास में बड़े सम्मान का दर्जा प्राप्त था।
5000 वर्षों की उपेक्षा
गत 5000 वर्षों में उसकी जो दुर्दशा, दुर्गति और अवमानना हुई है, शायद दुनिया में किसी अन्य वर्ग की इतनी नहीं हुई होगी।
आज जहाँ चारों ओर समृद्धि, विकास और मानवाधिकार को पाने की बात समस्त सृष्टि के जीवों हेतु हो रही हो, वहाँ भी इसका कोई वजूद न देखकर दुख के साथ हैरानी भी होती है कि इस लाचार अनपढ़ जोंकर (हिजड़ा) की ओर मानवता के हाथ कब मदद के लिए उठेंगे।
5000 वर्ष पूर्व खोया उसका सम्मान व वजूद कब लौटकर आएगा?
धर्म और किन्नर
संसार में जब भी मानव जाति की बात उठती है, तो उसके साथ धर्म की बात उठना स्वाभाविक है।
क्योंकि धर्म मनुष्य के लिए ही बना है। धर्म की जड़ मनुष्य की उत्पत्ति से पूर्व की मानी गई है। मनुष्य बिना धन के जी सकता है, किंतु बिना धर्म के नहीं।
मनुष्य में एक ओर जहाँ हिंसा कूट-कूटकर भरी हुई है, वहीं दूसरी ओर अहिंसा भी विद्यमान है। सच और झूठ के इस तराजू का काँटा मन पर कभी दाएँ तो कभी बाएँ प्रभाव व दबाव डालता है।
संसार का सबसे प्राचीन धर्म सनातन धर्म माना गया है।
किन्नर और सनातन धर्म
सनातन धर्म में त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव को क्रमशः सृष्टि के रचयिता, पालक एवं संहारक कहा गया है।
शिव के अनेकों स्वरूपों का बखान शास्त्रों में आता है। शिव का प्रतीकात्मक स्वरूप शिवलिंग है, जिसका हिन्दू धर्म में अत्यधिक पूजन होता है।
शिवलिंग को दो शक्तियों से निर्मित माना गया है। विज्ञान के दृष्टिकोण से यह (+ एवं –) धनात्मक एवं ऋणात्मक रूपी ब्रह्मांडीय विद्युत शक्तियों का प्रतीक है।
शिवलिंग स्वरूप सृष्टि में धनात्मक एवं ऋणात्मक रूपों में विभक्त होकर आपस में क्रियाशील होता है, जिससे सृष्टि का निर्माण एवं संचालन होता है।
इसी कारण आदि शिव को अर्धनारीश्वर भी कहा जाता है।
शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप और किन्नर
शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप में स्त्री एवं पुरुष दोनों के अर्धभाग को नख से शिख तक एकात्मक रूप से प्रदर्शित किया है। शिव के इस अर्धनारीश्वर स्वरूप को सारे हिन्दू पूजते हैं।
परंतु वहीं समाज के भीतर समाज द्वारा ही उत्पन्न एक ऐसी जाति जिसमें इन दोनों गुणों का मेल माना जाता है – जिसे हम “किन्नर” या “हिजड़ा” कहते हैं – उसे अपमानित किया जाता है।
जो अदृश्य है उसका सम्मान, किंतु जो व्यक्त है उसका अपमान। यह कैसी समझदारी है?
किन्नर का उल्लेख रामायण में
हिन्दू धर्म में रामायण का अति विशिष्ट स्थान रहा है। इसी रामायण ग्रंथ में अनेकों स्थानों पर “किन्नर” शब्द का प्रयोग मिलता है।
रामजी के जीवनकाल में:
देव, दानव, नर, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व आदि के साथ किन्नरों का भी उल्लेख हुआ है।
रामायण बालकांड में तुलसीदास जी लिखते हैं:
“देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्व।
बंदउ किन्नर रजनि चर कृपा करहु अब सर्व।।”
यहाँ देवता, नर, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, दानव इत्यादि के साथ किन्नरों को भी प्रणाम किया गया है।
माघ मेला और किन्नर
जब मकर संक्रांति पर प्रयागराज तीर्थ में माघ मेला लगता था, तब तुलसीदास जी लिखते हैं:
“माघ मकर रवी जब होई।
ति रथ पति हिं आव सब कोई।।
देव दनुज किन्नर नर श्रेणी।
सादर मजहि सकल त्रिवेणी।।”
अर्थात स्नान हेतु सबके साथ किन्नरों का भी आगमन होता था।
महाभारत और किन्नर
महाभारत काल में भी किन्नर समाज अपने बीच समानता के अधिकार से सम्मानित था।
भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण श्रीखंडी (हिजड़ा) बने। वास्तव में श्रीखंडी, राजकुमारी अम्बा का पुनर्जन्म था।
पांडवों के अज्ञातवास काल में अर्जुन “बृहन्नला” नामक हिजड़े के रूप में रहे और राजा विराट की पुत्री को संगीत की शिक्षा दी।
इससे स्पष्ट होता है कि उस काल में भी हिजड़ों को समाज में कला एवं अन्य सभी सामाजिक पहलुओं में समान अधिकार था।
आईये जानते है, कि भारत में कितनी नदियाँ है, और उनकी सूची के बारें में|
वैसे तो संसार मे बहुत नदियां हैं, पर नर्मदाजी के सिवा किसी भी नदी की प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करने का प्रमाण नहीं देखा गया है।
ऐसी नर्मदाजी अमरकंटक से प्रवाहित होकर रत्नासागर में समाहित हुई है और अनेक जीवों का उद्धार भी किया है।
प्रतिवर्ष माघ शुक्ल सप्तमी को पुण्यदायिनी मां नर्मदा का जन्मदिवस ‘नर्मदा जयंती महोत्सव’ के रूप में मनाया जाता है।
युगों से हम सभी शक्ति की उपासना करते आए हैं।
चाहे वह दैविक, दैहिक तथा भौतिक ही क्यों न हो, हम इसका सम्मान और पूजन करते हैं।
ऐसे में कोई शक्ति अजर-अमर होकर लोकहित में अग्रसर रहे तो उनका जन्म कौन नहीं मनाएगा।
एक समय सभी देवताओं के साथ में ब्रह्मा-विष्णु मिलकर भगवान शिव के पास आए, जो कि (अमरकंटक) मेकल पर्वत पर समाधिस्थ थे।
वे अंधकासुर राक्षस का वध कर शांत-सहज समाधि में बैठे थे।
अनेक प्रकार से स्तुति-प्रार्थना करने पर शिवजी ने आंखें खोलीं और उपस्थित देवताओं का सम्मान किया।
देवताओं ने निवेदन किया –
“हे भगवन्! हम देवता भोगों में रत रहने से, बहुत-से राक्षसों का वध करने के कारण हमने अनेक पाप किए हैं, उनका निवारण कैसे होगा आप ही कुछ उपाय बताइए।”
तब शिवजी की भृकुटि से एक तेजोमय बिन्दु पृथ्वी पर गिरा और कुछ ही देर बाद एक कन्या के रूप में परिवर्तित हुआ।
उस कन्या का नाम नर्मदा रखा गया और उसे अनेक वरदानों से सज्जित किया गया।
‘माघै च सप्तमयां दास्त्रामें च रविदिने।
मध्याह्न समये राम भास्करेण कृमागते॥’
माघ शुक्ल सप्तमी को मकर राशि सूर्य मध्याह्न काल के समय नर्मदाजी को जल रूप में बहने का आदेश दिया।
तब नर्मदाजी प्रार्थना करते हुए बोली –
“भगवन्! संसार के पापों को मैं कैसे दूर कर सकूंगी?”
तब भगवान विष्णु ने आशीर्वाद रूप में वक्तव्य दिया –
‘नर्मदे त्वें माहभागा सर्व
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग कम करने में हमारा योगदान
ग्लोबल वार्मिंग का मतलब है धरती का लगातार ज़रूरत से ज्यादा गर्म होते जाना। पिछले लगभग 140 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। सुनने में यह छोटा बदलाव लगता है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा है — हिमनदों का पिघलना, समुद्र का स्तर बढ़ना, बाढ़-सूखा जैसी आपदाओं में वृद्धि और इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों पर भी गंभीर खतरे।
इस समस्या का हल केवल सरकारों और वैज्ञानिकों पर नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि हम सभी अपनी रोज़मर्रा की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके इसमें योगदान दे सकते हैं।
नीचे कुछ प्रभावशाली तरीके दिए गए हैं जिनसे आप भी ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद कर सकते हैं:
1. पैदल चलना और साइकिल का प्रयोग
यदि आपका स्कूल, ऑफिस या बाज़ार पास में है, तो पैदल या साइकिल से जाएं।
इससे ईंधन की खपत कम होती है और प्रदूषण भी घटता है।
पैदल चलना आपके स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
2. सार्वजनिक परिवहन का उपयोग
जहाँ संभव हो वहाँ निजी गाड़ी की बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट (बस, ट्रेन, मेट्रो) का उपयोग करें।
एक ही वाहन में कई लोग सफर करते हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन काफी कम हो जाता है।
ट्रैफिक जाम और ईंधन खर्च दोनों घटते हैं।
3. ऊर्जा कुशल बल्ब (CFL/LED) का उपयोग
सीएफएल या एलईडी बल्ब साधारण बल्बों की तुलना में बहुत कम बिजली खर्च करते हैं।
ऊर्जा बचत = प्रदूषण में कमी।
बिजली बचाकर आप अपने बिजली बिल में भी कटौती कर सकते हैं।
4. बिजली की बचत
जरूरत न होने पर पंखे, लाइट, एसी बंद कर दें।
घर से बाहर निकलते समय सभी उपकरण स्विच ऑफ कर दें।
बिजली बचाना सीधा-सीधा कोयला और अन्य ईंधनों की खपत कम करना है, जिससे प्रदूषण कम होगा।
5. टीवी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सही ढंग से उपयोग करें 📺
कई बार टीवी या कंप्यूटर अनावश्यक रूप से चालू रहते हैं।
इन्हें बंद रखने से ऊर्जा और संसाधन बचते हैं।
उपकरणों की लाइफ भी बढ़ती है।
6. पेड़ लगाएँ और हरियाली बढ़ाएँ
एक पेड़ अपने जीवनकाल में हजारों किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकता है।
पेड़ हवा को शुद्ध करते हैं, छाया देते हैं और मिट्टी व जल संरक्षण में मदद करते हैं।
हर घर, गली, स्कूल और ऑफिस में पौधारोपण का अभियान चलाएँ।
7. शाकाहारी भोजन अपनाएँ
शोध बताते हैं कि मांस उत्पादन में अत्यधिक पानी, जमीन और ऊर्जा खर्च होती है।
पशुपालन से मीथेन गैस निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग को तेज़ी से बढ़ाती है।
शाकाहारी भोजन स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम है।
8. रिपेयर करवाएँ
कोई भी चीज़ खराब हो जाए तो तुरंत नई खरीदने की बजाय मरम्मत कराने का प्रयास करें।
इससे ई-वेस्ट (Electronic Waste) और प्लास्टिक कचरे की मात्रा घटती है।
संसाधनों का पुन: उपयोग होता है।
9. सेकेंड-हैंड सामान का उपयोग
यदि कोई चीज़ इस्तेमाल योग्य है, तो नया खरीदने से पहले सेकेंड-हैंड पर विचार करें।
इससे उत्पादन पर होने वाला प्राकृतिक संसाधनों का दबाव कम होगा।
“रीयूज़” करना पृथ्वी के लिए एक बड़ा सहयोग है।
10. रिसाइक्लिंग
पुरानी वस्तुओं जैसे प्लास्टिक, कांच, धातु और कागज को रिसाइकल करना चाहिए।
रिसाइक्लिंग से नए उत्पाद बनते हैं और वेस्ट की मात्रा घटती है।
यह प्रक्रिया ऊर्जा की खपत और प्रदूषण दोनों को कम करती है।
निष्कर्ष
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। इसका हल केवल बड़ी नीतियों या अंतरराष्ट्रीय समझौतों में नहीं छिपा है, बल्कि हमारी छोटी-छोटी आदतों में भी है।
यदि हम पैदल चलना, बिजली बचाना, पेड़ लगाना और रिसाइक्लिंग जैसी जिम्मेदारियाँ अपनाएँ, तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित पृथ्वी छोड़ सकते हैं।
याद रखें: “पृथ्वी हमारी नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है।”
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