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शास्त्रीय दृष्टिकोण और प्राचीन मान्यता
सनातन धर्म की विशेषता यह है कि उसने सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को किसी न किसी रूप में ईश्वरीय सत्ता का अंश माना है। वेद-पुराण, रामायण, महाभारत तथा अनेक स्मृतियों में विभिन्न वर्गों, जातियों और स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। इन्हीं में एक विशेष वर्ग किन्नर (हिजड़ा) भी है।
1. अर्धनारीश्वर स्वरूप और किन्नर का आध्यात्मिक महत्त्व
भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप यह संदेश देता है कि सृष्टि केवल पुरुष या स्त्री से नहीं, बल्कि दोनों के मिलन से ही संभव है। शिव का आधा शरीर पार्वती रूप में और आधा पुरुष रूप में है। यह स्त्री-पुरुष तत्वों की समन्वित शक्ति का प्रतीक है।
किन्नर समाज को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए क्योंकि उनमें ईश्वर की अद्भुत रचना है — न वे पूर्ण पुरुष हैं, न पूर्ण स्त्री। शास्त्र दृष्टि से वे शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप की जीवित अभिव्यक्ति हैं।
2. रामायण में किन्नरों का उल्लेख
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस में अनेक स्थानों पर किन्नरों का सम्मानपूर्वक उल्लेख है।
बालकांड में तुलसीदास लिखते हैं:
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्व ।
बंदऊ किन्नर रजनिचर कृपा करहु अप सर्व ॥यहाँ देवता, गंधर्व और अन्य प्राणियों के साथ किन्नरों का भी वंदन किया गया है।
मकर संक्रांति एवं प्रयागराज माघ मेला प्रसंग:
देव देनुज किन्नर नर श्रेणी।
सादर मजहि सकल त्रिवेणी ॥अर्थात किन्नर भी पवित्र संगम स्नान में सम्मिलित होते थे और उन्हें समाज में स्थान प्राप्त था।
राम राज्याभिषेक प्रसंग:
नभ ददुंभी बाजहि विपुल, गंधर्व किन्नर गावही।
नाचही उपछरा वृंद, परमानंद सुर मुनि पावही ॥यहाँ स्पष्ट है कि गंधर्वों की भाँति किन्नर भी गान-नृत्य द्वारा आनंद व्यक्त कर रहे थे।
रावण वध के उपरांत:
गावहि किन्नर सुबघू, नाचहि चढ़ी विमान ॥विजय उत्सव में किन्नरों की उपस्थिति उल्लेखनीय है।
इन प्रसंगों से सिद्ध होता है कि त्रेतायुग में किन्नर समाज को सम्मान प्राप्त था। वे यज्ञ, तीर्थ और उत्सवों का अभिन्न अंग थे।
3. महाभारत में किन्नरों की भूमिका
शिखंडी की कथा: अंबा का पुनर्जन्म शिखंडी हिजड़े के रूप में हुआ। भीष्म पितामह का वध शिखंडी की उपस्थिति में हुआ क्योंकि भीष्म स्त्री पर शस्त्र नहीं उठाते थे। इस प्रसंग से पता चलता है कि द्वापर युग में भी हिजड़े युद्ध नीति और राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे।
अर्जुन का बृहन्नला रूप: अज्ञातवास के समय अर्जुन ने बृहन्नला नामक हिजड़े का वेश धारण किया और राजा विराट की कन्या को नृत्य-संगीत सिखाया। यह दर्शाता है कि उस काल में किन्नर कला, संगीत और शिक्षा में दक्ष माने जाते थे।
4. पुराणों और अन्य ग्रंथों में उल्लेख
भागवत पुराण और अग्नि पुराण में किन्नरों का गंधर्वों, सिद्धों और अप्सराओं के साथ उल्लेख मिलता है।
यज्ञ प्रसंगों में भी किन्नरों को आमंत्रित किया जाता था।
देव-नाग-गंधर्व-किन्नर सभा का उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में मिलता है।
इससे यह स्पष्ट है कि प्राचीन काल में किन्नरों को देवतुल्य मान्यता प्राप्त थी, उनका सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन सम्मानजनक था।
वर्तमान स्थिति और सामाजिक मान्यता
1. पतन की शुरुआत
इतिहास के मध्यकाल में जब समाज में वर्ण और जातिगत भेदभाव गहराया, तब किन्नरों की स्थिति गिरने लगी। विदेशी आक्रमणों और सामाजिक कुरीतियों के कारण उन्हें दरबारों में नृत्य-गान तक सीमित कर दिया गया। धीरे-धीरे उनका सम्मान छिनता गया और वे उपहास का विषय बन गए।
2. आज की स्थिति
आज किन्नर समाज की छवि समाज में उपेक्षित और हाशिए पर रहने वाले वर्ग के रूप में है।
उन्हें अक्सर “हिजड़ा” या “छक्का” कहकर अपमानित किया जाता है।
शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से वे वंचित रहते हैं।
अधिकांश किन्नरों को भीख, नाच-गाने या देह-व्यापार जैसे कार्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।
सरकारी योजनाएँ होते हुए भी सामाजिक स्वीकृति न मिलने से वे लाभ नहीं उठा पाते।
3. धार्मिक विडंबना
विरोधाभास यह है कि जिन किन्नरों को लोग मंगल कार्यों (जैसे बच्चे के जन्म या विवाह) में शुभ मानकर बुलाते हैं, वही समाज उन्हें अपने साथ बैठाने में शर्म अनुभव करता है।
एक ओर मंदिरों में अर्धनारीश्वर की पूजा होती है, दूसरी ओर उनके जीवंत स्वरूप को समाज अपमानित करता है। यह एक गहरी सामाजिक विसंगति है।
4. मानवतावादी दृष्टि
वेदों में कहा गया है —
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” — यह पृथ्वी हमारी माता है और हम सब उसके पुत्र हैं।
इस दृष्टि से देखा जाए तो हर प्राणी भाई-बहन है। किन्नर भी उसी ईश्वर की संतान हैं। उनका सम्मान करना मानवता का प्रथम धर्म है।
5. उत्थान के उपाय
किन्नर समाज का वास्तविक उत्थान तभी संभव है जब समाज, शासन और स्वयं किन्नर मिलकर सकारात्मक प्रयास करें।
शिक्षा का अधिकार – विशेष विद्यालय, छात्रवृत्ति और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र बनाकर उन्हें मुख्यधारा में लाया जाए।
रोजगार के अवसर – निजी एवं सरकारी संस्थानों में आरक्षण या विशेष कोटा देकर उन्हें सम्मानजनक नौकरी प्रदान की जाए।
स्वास्थ्य सुविधाएँ – मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य हेतु विशेष चिकित्सा योजनाएँ चलाई जाएँ।
धार्मिक व सामाजिक सम्मान – मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
सकारात्मक छवि निर्माण – मीडिया, फिल्मों और साहित्य में किन्नरों की सशक्त व सकारात्मक छवि प्रस्तुत की जाए।
स्वयं सहायता समूह – किन्नरों के अपने संगठन को शिक्षित और सशक्त बनाकर स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ाया जाए।
कानूनी अधिकार – सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 में किन्नरों को “थर्ड जेंडर” का दर्जा दिया। इसे सामाजिक स्तर पर लागू करना आवश्यक है।
6. पुनः सम्मान की आवश्यकता
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि समाज किन्नरों को फिर से वही मानवीय सम्मान और धार्मिक महत्त्व दे जो रामायण-महाभारत के युग में था।
यदि हम सच में सनातन धर्म के अनुयायी हैं तो हमें याद रखना चाहिए कि भगवान राम ने किन्नरों को प्रणाम किया था, अर्जुन ने बृहन्नला रूप में जीवन बिताया था और शिखंडी जैसे किन्नर ने धर्मयुद्ध की धारा मोड़ दी थी।
किन्नर समाज न तो केवल उपहास का पात्र है, न केवल किसी शुभ अवसर पर ताली बजाकर आशीर्वाद देने वाला वर्ग। वे हमारी ही तरह मनुष्य हैं, और उनसे जुड़े अनेक आध्यात्मिक व सांस्कृतिक आयाम हैं।
सनातन धर्म की मूल शिक्षा है — “सर्वे भवन्तु सुखिनः”। यदि हम किन्नरों को समाज की मुख्यधारा में पुनः सम्मानपूर्वक स्थान नहीं देंगे, तो हमारी यह शिक्षा अधूरी रहेगी।
इसलिए किन्नर समाज का उत्थान केवल सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि धार्मिक और मानवीय कर्तव्य है।
माँ नर्मदा महिमा और परिक्रमा
1. नर्मदा का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में नर्मदा नदी का विशेष स्थान है।
देवों के देव महादेव की पुत्री होने के कारण उन्हें शांकरी, रुद्रदेह, रेवा, मेकलसुता आदि नामों से पुकारा जाता है।
नर्मदा पुराण में उल्लेख है कि गंगा में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह माँ नर्मदा के केवल दर्शन से ही प्राप्त हो जाता है।
वायु पुराण के अनुसार शिव के तांडव से निकले पसीने से नर्मदा की उत्पत्ति हुई।
स्कन्द पुराण के अनुसार शिव की तपस्या के दौरान निकले पसीने की बूंद से यह पावन धारा प्रवाहित हुई।
नर्मदा जयंती हर वर्ष माघ शुक्ल सप्तमी को मनाई जाती है।
2. उद्गम और प्रवाह
नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक (मध्यप्रदेश) है।
लगभग 1312 किमी बहने के बाद यह भरुच (गुजरात) में अरब सागर में मिलती है।
मध्यप्रदेश में इसका प्रवाह 1077 किमी है।
इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ तवा, हिरन, शेर, शक्कर, दुधी, गोई आदि हैं।
नर्मदा के तट पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है।
3. नर्मदा का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व
“नर्मदा के कंकर-कंकर में शंकर” की उक्ति प्रसिद्ध है।
नर्मदा तट पर अनेक आश्रम, तीर्थ और सिद्ध क्षेत्र हैं।
संतों का मानना है कि नर्मदा केवल जलधारा नहीं बल्कि जीवदायिनी और मोक्षदायिनी माता हैं।
4. नर्मदा और रोजगार
नर्मदा जल का उपयोग सिंचाई और ऊर्जा उत्पादन में भी होता है।
नर्मदा मास्टर प्लान (1972) के अंतर्गत बड़ी, मध्यम और लघु सिंचाई योजनाएँ बनीं।
प्रमुख परियोजनाएँ – इंदिरा सागर बांध, ओंकारेश्वर बांध, रानी अवंति बाई लोधी सागर बांध, सरदार सरोवर बांध।
नर्मदा परिक्रमा
1. परिक्रमा की विशिष्टता
भारत में अनेक नदियाँ हैं, परंतु केवल नर्मदा ही ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है।
इसका कारण यह है कि नर्मदा को जीवित देवी माना गया है।
अन्यत्र केवल तीर्थ की परिक्रमा होती है, परंतु यहाँ पूरी नदी की परिक्रमा करने की परंपरा है।
2. परिक्रमा की विधि
परिक्रमा अमरकंटक से आरंभ होकर एक किनारे से चलते हुए भरुच (गुजरात) में समुद्र संगम तक पहुँचती है।
फिर वहाँ से दूसरे किनारे से लौटकर पुनः अमरकंटक पहुँचने पर परिक्रमा पूर्ण होती है।
कुल दूरी लगभग 3500 किमी होती है।
3. नियम व व्रत
परिक्रमा व्रती प्रायः नंगे पैर चलते हैं।
भोजन भिक्षा या साधारण अन्न से होता है।
भूमि पर ही शयन और ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है।
परिक्रमा प्रायः 3 वर्ष, 3 माह और 13 दिन में पूर्ण होती है।
परिक्रमा व्रती को “नर्मदा परिक्रमावासी” कहा जाता है।
4. आध्यात्मिक महत्व
नर्मदा परिक्रमा करने से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
यह परिक्रमा साधक को परम शांति और मोक्ष की ओर ले जाती है।
निष्कर्ष
माँ नर्मदा केवल एक नदी नहीं हैं, बल्कि सनातन संस्कृति में शिवपुत्री, जीवदायिनी और मोक्षदायिनी माता के रूप में पूजनीय हैं। उनके तट पर स्थित तीर्थ, उनके जल का पान और उनकी परिक्रमा — ये सभी जीवन को पवित्र, कल्याणकारी और मोक्षदायी बना देते हैं।
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जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग कम करने में हमारा योगदान
ग्लोबल वार्मिंग का मतलब है धरती का लगातार ज़रूरत से ज्यादा गर्म होते जाना। पिछले लगभग 140 वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। सुनने में यह छोटा बदलाव लगता है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा है — हिमनदों का पिघलना, समुद्र का स्तर बढ़ना, बाढ़-सूखा जैसी आपदाओं में वृद्धि और इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों पर भी गंभीर खतरे।
इस समस्या का हल केवल सरकारों और वैज्ञानिकों पर नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि हम सभी अपनी रोज़मर्रा की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके इसमें योगदान दे सकते हैं।
नीचे कुछ प्रभावशाली तरीके दिए गए हैं जिनसे आप भी ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद कर सकते हैं:
1. पैदल चलना और साइकिल का प्रयोग
यदि आपका स्कूल, ऑफिस या बाज़ार पास में है, तो पैदल या साइकिल से जाएं।
इससे ईंधन की खपत कम होती है और प्रदूषण भी घटता है।
पैदल चलना आपके स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है।
2. सार्वजनिक परिवहन का उपयोग
जहाँ संभव हो वहाँ निजी गाड़ी की बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट (बस, ट्रेन, मेट्रो) का उपयोग करें।
एक ही वाहन में कई लोग सफर करते हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन काफी कम हो जाता है।
ट्रैफिक जाम और ईंधन खर्च दोनों घटते हैं।
3. ऊर्जा कुशल बल्ब (CFL/LED) का उपयोग
सीएफएल या एलईडी बल्ब साधारण बल्बों की तुलना में बहुत कम बिजली खर्च करते हैं।
ऊर्जा बचत = प्रदूषण में कमी।
बिजली बचाकर आप अपने बिजली बिल में भी कटौती कर सकते हैं।
4. बिजली की बचत
जरूरत न होने पर पंखे, लाइट, एसी बंद कर दें।
घर से बाहर निकलते समय सभी उपकरण स्विच ऑफ कर दें।
बिजली बचाना सीधा-सीधा कोयला और अन्य ईंधनों की खपत कम करना है, जिससे प्रदूषण कम होगा।
5. टीवी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सही ढंग से उपयोग करें 📺
कई बार टीवी या कंप्यूटर अनावश्यक रूप से चालू रहते हैं।
इन्हें बंद रखने से ऊर्जा और संसाधन बचते हैं।
उपकरणों की लाइफ भी बढ़ती है।
6. पेड़ लगाएँ और हरियाली बढ़ाएँ
एक पेड़ अपने जीवनकाल में हजारों किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकता है।
पेड़ हवा को शुद्ध करते हैं, छाया देते हैं और मिट्टी व जल संरक्षण में मदद करते हैं।
हर घर, गली, स्कूल और ऑफिस में पौधारोपण का अभियान चलाएँ।
7. शाकाहारी भोजन अपनाएँ
शोध बताते हैं कि मांस उत्पादन में अत्यधिक पानी, जमीन और ऊर्जा खर्च होती है।
पशुपालन से मीथेन गैस निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग को तेज़ी से बढ़ाती है।
शाकाहारी भोजन स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम है।
8. रिपेयर करवाएँ
कोई भी चीज़ खराब हो जाए तो तुरंत नई खरीदने की बजाय मरम्मत कराने का प्रयास करें।
इससे ई-वेस्ट (Electronic Waste) और प्लास्टिक कचरे की मात्रा घटती है।
संसाधनों का पुन: उपयोग होता है।
9. सेकेंड-हैंड सामान का उपयोग
यदि कोई चीज़ इस्तेमाल योग्य है, तो नया खरीदने से पहले सेकेंड-हैंड पर विचार करें।
इससे उत्पादन पर होने वाला प्राकृतिक संसाधनों का दबाव कम होगा।
“रीयूज़” करना पृथ्वी के लिए एक बड़ा सहयोग है।
10. रिसाइक्लिंग
पुरानी वस्तुओं जैसे प्लास्टिक, कांच, धातु और कागज को रिसाइकल करना चाहिए।
रिसाइक्लिंग से नए उत्पाद बनते हैं और वेस्ट की मात्रा घटती है।
यह प्रक्रिया ऊर्जा की खपत और प्रदूषण दोनों को कम करती है।
निष्कर्ष
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। इसका हल केवल बड़ी नीतियों या अंतरराष्ट्रीय समझौतों में नहीं छिपा है, बल्कि हमारी छोटी-छोटी आदतों में भी है।
यदि हम पैदल चलना, बिजली बचाना, पेड़ लगाना और रिसाइक्लिंग जैसी जिम्मेदारियाँ अपनाएँ, तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और सुरक्षित पृथ्वी छोड़ सकते हैं।
याद रखें: “पृथ्वी हमारी नहीं, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है।”
